Class 10th History Vvi Subjective Question Pdf Download
| Subject | History |
| Class 10th | Board Exam 2027 |
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Subjective Question Answer
यूरोप में राष्ट्रवाद
1. 1848 के फ्रांसीसी क्रांति के कारण क्या थे?
लुई फिलिप की विफलता: राजा लुईफिलिप एक उदारवादी लेकिन महत्वाकांक्षी शासक था, जिसके पास कोई सुधारात्मक कार्यक्रम नहीं था।
गीजो की दमनकारी नीतियां: उसने गीजो को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया, जो किसी भी प्रकार के वैधानिक और सामाजिक सुधारों के विरुद्ध था।
भुखमरी और बेरोजगारी: देश में बेरोजगारी, भुखमरी और आर्थिक संकट अत्यधिक बढ़ गया था, जिससे जनता में भारी असंतोष था।
सुधारवादियों का विरोध: सुधारवादी 22 फरवरी 1848 को पेरिस में एक भोज का आयोजन करना चाहते थे, जिस पर सरकार ने रोक लगा दी, जिससे क्रांति भड़क उठी।
2. इटली, जर्मनी के एकीकरण में ऑस्ट्रिया की भूमिका क्या थी?
एकीकरण में मुख्य बाधा: ऑस्ट्रिया दोनों देशों (इटली और जर्मनी) के एकीकरण का सबसे बड़ा विरोधी और मुख्य बाधा था।
चांसलर मेटरनिख की नीति: ऑस्ट्रिया का चांसलर मेटरनिख घोर प्रतिक्रियावादी था। उसने इटली और जर्मनी में राष्ट्रीयता की भावनाओं को कुचलने के लिए दमनकारी नीति अपनाई।
हस्तक्षेपः इटली के राज्यों (जैसे लोम्बार्डी और वेनेशिया) पर ऑस्ट्रिया का सीधा नियंत्रण था। वह जर्मनी के आंतरिक मामलों में भी हस्तक्षेप करता था ताकि वहां एकता स्थापित न हो सके।
3. यूरोप में राष्ट्रवाद को फैलाने में नेपोलियन बोनापार्ट किस तरह सहायक हुआ?
साम्राज्य विस्तारः नेपोलियन ने अपनी विजय यात्राओं द्वारा यूरोप के कई राज्यों को जीतकर वहां की पुरानी व्यवस्था को समाप्त किया।
प्रशासनिक एकरूपता: उसने जीते हुए क्षेत्रों में एक समान प्रशासनिक कानून (नेपोलियन कोड) लागू किया, जिससे लोगों में समानता की भावना जागी।
जर्मन और इतालवी संघः उसने जर्मनी में 39 राज्यों का ‘राइन संघ’ और इटली में राज्यों को मिलाकर राष्ट्रीय एकता का मार्ग प्रशस्त किया।
क्रांति के संदेश का प्रसार: उसके अभियानों ने यूरोप के कोने-कोने में फ्रांसीसी क्रांति के ‘स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व’ के विचारों को फैलाया।
4. गैरीबाल्डी के कार्यों की चर्चा करें।
सशस्त्र क्रांति का नेतृत्वः गैरीबाल्डी इटली के एकीकरण का ‘तलवार’ माना जाता है। उसने लाल कुर्ती (Red Shirts) नाम से स्थानीय किसानों और स्वयंसेवकों की एक सशस्त्र सेना तैयार की।
नेपल्स और सिसली की विजयः उसने अपनी सेना की मदद से इटली के दक्षिणी राज्यों- नेपल्स और सिसली पर आक्रमण कर वहाँ के अत्याचारी बूर्बो राजवंश को उखाड़ फेंका।
सत्ता का त्यागः उसने जीते हुए सभी राज्यों को बिना किसी लालच के विक्टर इमैनुएल द्वितीय को सौंप दिया और खुद एक साधारण किसान का जीवन जीने के लिए अपनी सारी संपत्ति राष्ट्र को समर्पित कर दी।
5. विलियम । के बगैर जर्मनी का एकीकरण बिस्मार्क के लिए असंभव था-कैसे?
बिस्मार्क को पूर्ण स्वतंत्रताः विलियम प्रथम एक दूरदर्शी और राष्ट्रवादी राजा था। उसने बिस्मार्क की सैन्य और कूटनीतिक क्षमताओं को पहचाना और उसे चांसलर नियुक्त कर फैसले लेने की पूरी छूट दी।
सैन्य सुधारों का समर्थन: बिस्मार्क की ‘रक्त और लौह’ (Blood and Iron) की नीति के लिए एक मजबूत सेना की आवश्यकता थी। विलियम प्रथम ने संसद के विरोध के बावजूद सेना के आधुनिकीकरण और बजट को मंजूरी दी।
कठिन समय में अडिग रहनाः एकीकरण के युद्धों (डेनमार्क, ऑस्ट्रिया और फ्रांस के खिलाफ) के दौरान जब भी बिस्मार्क को विरोध का सामना करना पड़ा, विलियम प्रथम उसके साथ मजबूती से खड़ा रहा। इसलिए, विलियम प्रथम के बिना बिस्मार्क के पास संसाधन और राजनैतिक शक्ति नहीं होती।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (लगभग 150 शब्दों में)
1. इटली के एकीकरण में मेजिनी, काबूर और गैरीबाल्डी के योगदानों को बताएं।
Answer: इटली का एकीकरण इन तीन महानायकों के त्रिकोणीय प्रयासों का परिणाम था, जिन्हें इटली का ‘दिल’, ‘दिमाग’ और ‘तलवार’ कहा जाता है:
मेजिनी (राष्ट्रवाद की आत्मा): मेजिनी ने
इटली के लोगों में राष्ट्रवाद की भावना का संचार किया। उसने 1831 में ‘यंग इटली’ संस्था की स्थापना की, जिसका उद्देश्य विदेशी हस्तक्षेप को समाप्त कर इटली को एक गणराज्य बनाना था। हालाँकि वह सीधे तौर पर सफल नहीं हुआ, लेकिन उसने एकीकरण की वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार की।
काउंट काबूर (कूटनीति का मस्तिष्क):
काबूर पीडमोंट-सारडीनिया का प्रधानमंत्री था। वह एक व्यावहारिक कूटनीतिज्ञ था। उसने फ्रांस के साथ संधि करके ऑस्ट्रिया को युद्ध में हराया और उत्तरी तथा मध्य इटली के राज्यों (जैसे लोंबार्डी, मोडेना, टस्कनी) को सारडीनिया में मिला लिया। उसने इटली की समस्या को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उठाया।
गैरीबाल्डी (क्रांति की तलवार)-
गैरीबाल्डी ने अपनी गुरिल्ला सेना की मदद से तलवार के बल पर दक्षिणी इटली (नेपल्स और सिसली) को मुक्त कराया। उसने इन राज्यों को विक्टर इमैनुएल को सौंप दिया, जिससे दक्षिणी और उत्तरी इटली का मिलाप संभव हुआ।
प्रश्न 2: जर्मनी के एकीकरण में बिस्मार्क की भूमिका का वर्णन करें।
उत्तरःऑटो वॉन बिस्मार्क जर्मनी के एकीकरण के मुख्य सूत्रधार थे। वे प्रशा (Prussia) के चांसलर थे और उनका मानना था कि जर्मनी का एकीकरण केवल भाषणों से नहीं, बल्कि सैन्य शक्ति से ही संभव है:
रक्त और लोहे की नीति (Blood and Iron Policy): बिस्मार्क ने जर्मनी के एकीकरण के लिए कठोर सैन्य नीति अपनाई। उन्होंने प्रशा की सेना का आधुनिकीकरण और सुदृढ़ीकरण किया।
तीन निर्णायक युद्धः बिस्मार्क ने अपनी कुशल कूटनीति और सैन्य बल से छह वर्षों (1864-1870) के भीतर तीन प्रमुख युद्ध लड़ेः
1. डेनमार्क से युद्ध (1864): ऑस्ट्रिया के साथ मिलकर डेनमार्क को हराया और श्लेसविग-होल्स्टीन राज्यों पर नियंत्रण पाया।
2. ऑस्ट्रिया से युद्ध (सेडोवा का युद्ध, 1866): ऑस्ट्रिया को पराजित कर उसे जर्मन संघ से बाहर निकाला, जिससे उत्तरी जर्मन महासंघ का गठन हुआ।
3. फ्रांस से युद्ध (सेडान का युद्ध, 1870): फ्रांस को निर्णायक रूप से हराकर दक्षिणी जर्मन राज्यों को भी शामिल कर लिया।
एकीकरण की पूर्णता: 1871 ई. में फ्रैंकफर्ट की संधि के बाद जर्मनी का पूर्ण एकीकरण हुआ और प्रशा के राजा विलियम प्रथम को एकीकृत जर्मनी का सम्राट घोषित किया गया।
प्रश्न 3: राष्ट्रवाद के उदय के कारणों एवं प्रभाव की चर्चा करें।
उत्तरः19वीं शताब्दी में यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय एक युगांतकारी घटना थी, जिसने पूरे विश्व के इतिहास को बदल दिया।
उदय के मुख्य कारणःफ्रांसीसी क्रांति (1789):
इस क्रांति ने’स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व’ का नारा दिया, जिसने लोगों में एक साझा राष्ट्रीय पहचान की भावना पैदा की।
नेपोलियन के सैन्य अभियानः नेपोलियन ने जब विभिन्न यूरोपीय राज्यों को जीता, तो वहां अप्रत्यक्ष रूप से प्रशासनिक एकता और राष्ट्रवाद की भावना का प्रसार हुआ।
मध्यम वर्ग का उदयः औद्योगिक क्रांति के कारण एक नए शिक्षित मध्यम वर्ग (शिक्षक, डॉक्टर, व्यापारी) का उदय हुआ, जिसने रूढ़िवादी और निरंकुश राजतंत्र का विरोध किया।
राष्ट्रवाद के मुख्य प्रभावः
नए राष्ट्र-राज्यों का उदयः राष्ट्रवाद के प्रभाव स्वरूप इटली और जर्मनी जैसे बिखरे हुए क्षेत्रों का एकीकरण हुआ और नए शक्तिशाली राष्ट्र अस्तित्व में आए।
राजतंत्र का पतनः यूरोप के कई हिस्सों में निरंकुश और जनविरोधी राजतंत्रों का अंत हुआ तथा उनके स्थान पर संवैधानिक व लोकतांत्रिक सरकारों की नींव पड़ी।
साम्राज्यवाद का विकासः आगे चलकर यही राष्ट्रवाद ‘उग्र राष्ट्रवाद’ में बदल गया, जिससे यूरोपीय देशों में उपनिवेश बनाने और साम्राज्य विस्तार की होड़ लग गई, जो प्रथम विश्व युद्ध का एक कारण बनी।
प्रश्न 4: जुलाई 1830 की क्रांति का विवरण दें।
उत्तरःफ्रांस की जुलाई 1830 की क्रांति वहां के निरंकुश और प्रतिक्रियावादी शासक चार्ल्स दशम (Charles X) की नीतियों के खिलाफ एक सशक्त जन-विद्रोह था।
क्रांति का मुख्य कारणः चार्ल्स दशम फ्रांस में पुरातन व्यवस्था को फिर से लागू करना चाहता था। उसने धोर प्रतिक्रियावादी नेता पोलिग्नेक (Polignac) को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया। पोलिग्नेक ने पूर्व में लागू समान नागरिक संहिता के स्थान पर शक्तिशाली अभिजात वर्ग को विशेषाधिकार देने का प्रयास किया, जिससे उदारवादियों में गहरा असंतोष फैल गया।
चार अध्यादेश (Four Ordinances): इस असंतोष को दबाने के लिए 25 जुलाई 1830 को चार्ल्स दशम ने चार दमनकारी अध्यादेश जारी किए। इनके द्वारा प्रेस की स्वतंत्रता पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया, प्रतिनिधि सभा को भंग कर दिया गया, और मतदान के अधिकार को अत्यंत सीमित कर दिया गया।
क्रांति की शुरुआत और परिणामः इन अध्यादेशों के विरोध में पेरिस में 27 जुलाई 1830 से भीषण गृहयुद्ध शुरू हो गया, जिसे इतिहास में ‘तीन गौरवशाली दिन’ (Three Glorious Days) कहा जाता है। जनता, छात्रों और सैनिकों ने मिलकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। स्थिति को भांपते हुए चार्ल्स दशम ने गद्दी छोड़ दी और इंग्लैंड भाग गया। इसके साथ ही फ्रांस में बूर्बो राजवंश का अंत हुआ और उसके स्थान पर आर्लेयंस वंश के लुई फिलिप को एक संवैधानिक राजा के रूप में गद्दी पर बैठाया गया। इस क्रांति ने पूरे यूरोप के अन्य देशों में भी राष्ट्रीय आंदोलनों की लहर पैदा कर दी।
प्रश्न 5: यूनानी स्वतंत्रता आन्दोलन का संक्षिप्त विवरण दें।
उत्तरःयूनान (Greece) का स्वतंत्रता आंदोलन यूरोपीय इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी, जिसने सदियों पुरानी ऑटोमन साम्राज्य (तुर्की) की गुलामी से यूनान को मुक्त कराया।
आंदोलन की पृष्ठभूमिः यूनान का अपना एक गौरवशाली इतिहास और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत थी, लेकिन वह 15वीं शताब्दी से ऑटोमन साम्राज्य (तुर्की) के अधीन था। फ्रांस की क्रांति और यूरोप में बढ़ते राष्ट्रवाद से प्रभावित होकर यूनानियों में भी स्वतंत्रता की भावना जागी। इसके लिए ‘हेतेरिया फिलाइक’ जैसी गुप्त संस्थाओं ने जनता में चेतना फैलाई।
स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत: 1821 ई. में अलेक्जेंडर चिप्सिलांटी के नेतृत्व में विद्रोह की शुरुआत हुई। तुर्की के सुल्तान ने इस विद्रोह को कुचलने के लिए बर्बरता का सहारा लिया, जिससे पूरे यूरोप के ईसाई देश तुर्की के खिलाफ हो गए। इंग्लैंड के महान कवि लॉर्ड बायरन स्वयं यूनानियों के लिए युद्ध लड़ने गए, जहाँ उनकी मृत्यु हो गई।
यूरोपीय देशों का समर्थन और परिणामः 1826 ई. में ब्रिटेन और रूस ने यूनान के समर्थन में समझौता किया। बाद में फ्रांस भी इसमें शामिल हो गया। 1827 ई. में नवारिनो की खाड़ी के युद्ध में ब्रिटेन, फ्रांस और रूस की संयुक्त नौसेना ने तुर्की और उसके सहयोगी मिस्र की सेना को बुरी तरह पराजित किया। अंततः 1829 ई. में एड्रियानोपुल की संधि हुई, और आगे चलकर 1832 ई. की कुस्तुनतुनिया की संधि (Treaty of Constantinople) के द्वारा यूनान को एक
स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता दे दी गई। बावरिया के राजकुमार ऑटो को स्वतंत्र यूनान का पहला राजा घोषित किया गया।
